राजस्थानी लघु चित्रों में ‘श्रीकृष्ण’ चित्रण

Periodic Research (P: ISSN No. 2231-0045 RNI No. UPBIL/2012/55438 VOL.-7, ISSUE-4, May-2019 E: ISSN No. 2349-9435)

 Abstract



 पवन कुमार जाँगिड

सहायक आचार्य ,

चित्रकला विभाग,

श्री रतनलाल कंवरलाल पाटनी

राजकीय स्नातकोत्तर

महाविद्यालय,

किशनगढ, राजस्थान



जितेश कुमार जांगिड़

सहायक आचार्य ,

चित्रकला विभाग,

एस.जी.पी.बी. राजकीय कन्या

महाविद्यालय,

पाली, राजस्थान

कला के क्षेत्र म ें राजस्थान के लघु चित्र विश्वकला की अनमा ेल

धरोहर ह ैं किशनगढ़, ब ूंदी, कोटा, उदयप ुर, जोधप ुर, जयप ुर, बीकानेर तथा

अलवर आदि विभिन्न शैलियों म ें जो लधु चित्रों की परम्परा विकसित र्ह ुइ  ह ै

उसने न केवल राजस्थान के कलात्मक गौरव को विकसित किया अपितु सम्प ूर्ण 

देश के लिए य े कला शैलिया ँ कला की अनुपम देन सिद्ध र्हुइ । अपभ्रंश,

गुजराती व स्थानीय शैलियों से प ्रश्रय पाकर उद्भव हा ेने वाली राजस्थानी शैली

म ुगल प ्रभाव ग्रहण कर और भी परिष्कृत र्हुइ ।

जिस प ्रकार यूनान म ें वीनस व रोम म ें अफ्रोदिती को महत्व दिया

गया है। उसी प ्रकार भारतीय पारम्परिक लघ ु चित्रों के रचयिताआ ें न े अपन े

चित्रांकन म ें जितना अंकन श्रीकृष्ण और उनकी लीलाओं का किया है उतना

अन्य किसी विषय का नहीं। श्रीकृष्ण व उनक े विभिन्न रूपो का अंकन उनक े

लिए सदैव प ्रेरणादायी रहा है।

ए ेतिहासिक तथ्यानुसार कला म ें श्रीकृष्ण लीलाओं का अंकन शुंग,

कुषाण, गुप्त काल से ल ेकर उत्तर मध्य काल म ें अपभ्रंश शैली के उद्भव क े

साथ ही इनकी विभिन्न लीलाआ ें को कलाकारो ं ने अपनी तूलिका का विषय

बनाया।

तत्कालीन कवियों तथा चित्रकारों न े श्रीकृष्ण के विभिन्न रूपांे म ें

उनकी शिशु अवस्था, बाल लिलाओं तथा उनको श्रं ृगार व अभिसार का प ्रतीक

मानकर उन्हें नायिकाओ ं के साथ प ्रेम प ्रसंग म ें संलग्न दिखाया गया है तथा

इनके प ्रेम रूप को संयोग व वियोग, दोना ें रंगो म ें अपनी रचना म ें उपस्थित

किया है। यही कारण है कि प ्रत्य ेक काव्य तथा चित्र कृति के प ्रम ुख नायक

श्रीकृष्ण माने गय े परिणाम स्वरूप राजस्थान लघु चित्र कला म ें श्रीकृष्ण लीला

से सम्बद्ध असंख्य चित्र तैयार हुए।


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