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हिन्दी कथा साहित्य में बाल विमश Child Discourse in Hindi Fiction

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Shrinkhla Ek Shodhparak Vaicharik Patrika  : ISSN NO.: 2321-290X RNI : UPBIL/2013/55327 VOL-8* ISSUE-8* April- 2021 Paper Submission: 02/04/2021, Date of Acceptance: 20/04/2021, Date of Publication: 23/04/2021 वर्षा रानी सहायक प्राध्यापक, हिन्दी विभाग, ड श्यामा प्रसाद मुखर्जी राजकीय महाविद्यालय, भदोही, उत्तर प्रदेश, भारत                                                    Abstract   समकालीन हिंदी कथा साहित्य में बाल कहानियां एक अलग विधा के रूप में प्रतिष्ठित हा े रही हैं। यद्यपि यह कथा साहित्य का ही एक अंग है, तथापि स्त्री विमर्श, दलित विमर्श आदि विमर्श क े साहित्य के समान ही बाल साहित्य को भी बाल विमर्श क े अंतर्गत देखा जा रहा ह ै। बाल साहित्य छोटी उम्र क े बच्चों को ध्यान में रखकर लिखा गया साहित्य होता है। बाल साहित्य...

बुन्देली के वीरता-परक काव्य का अनुशीलन Bundeli's Heroic Poetry

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Innovation : The Research Concept  ISSN No. 2456–5474   RNI No. UPBIL/2016/68367  Vol.-6* Issue-2* March- 2021   Paper Submission: 05/03/2021, Date of Acceptance: 17/03/2021, Date of Publication: 25/03/2021 जी.पी. अहिरवार एसोसिएट प्रोफेसर, हिन्दी विभाग, शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, दमोह, मध्य प्रदेश, भारत                                                        Abstract   वीरता पा ैरूष की विभूति आ ैर वाणी का श ृंगार ह ै, इसलिए संसार की सभी समृद्ध भाषाआ ें में वीरों की प ्रशस्ति आ ैर उनके दिव्य गुणगान की परम्परा अति प्राचीन काल से विद्यमान ह ै। भारतीय साहित्य में ऋग्वेद में वीर शब्द श ूर अथवा योद्धा के अर्थ  में व्यवहृत ह ुआ है। रस सिद्धांत की दृष्टि से वीर रस का सीधा सम्बन्ध युद्धवीर से ह ै। बुन्...

चन्द्रग ुप्त नाटक का आधुनिक संदर्भ Modern Reference To Chandragupta Drama.

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  Anthology The Research: (ISSN: 2456–4397 RNI No.UPBIL/2016/68067  VOL- V * ISSUE- V * August - 2020   )   Paper Submission: 15/08/2020, Date of Acceptance: 26/08/2020, Date of Publication: 27/08/2020  रामाश्रय सिंह  वरिष्ठ सहायक प्रोफेसर,  हिन्दी विभाग   महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ,   वारा.ासी, उत्तर प्रदे”ा, भारत Abstract  चन्द्रÛुप्त नाटक का मुख्य उद्देश्य भारतीय जनता को नवजाÛर.ा का नवीन संदेश द ेना रहा ह ै। ताकि भारतीय जनता में स्वतं=ता संÛ्राम की प ूरी निष्ठा और लÛन-जाÛ जाये। कार.ा कि अंÛ्र ेज अजेय नहीं ह ै ं? उन्ह ें हराया जा सकता ह ै। अंÛ्र ेज कहीं से श्र ेष्ठ नहीं ह ैं? भारत का प ्राचीन इतिहास अत्यन्त समृ), शक्तिशाली आ ैर प ्रत्येक दृष्टि से महान रहा है। अपनी श्रेष्ठता की यह अनुभूति ही भारतीयों का े दृ.ा आत्मविश्वास से भर अ ंÛ्र ेजा ें से सामना करने में समर्थ  बना सकेÛी। इस अनुभूति का े जाÛृत करने के लिये ही प्रसाद जी ने सन् 1931 में चन्द्रÛुप्त नाटक का रचना की थी। यानी भारत के अतीत, वर्तमान व भविष्य को आधुनिक संदर्भ...

पर्यावरण प्रब ंधन व मानवाधिकार Enviournment Management and Human Rights

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  Anthology The Research: (ISSN: 2456–4397 RNI No.UPBIL/2016/68067 Vol-5* Issue-9* December-2020)   Paper Submission: 15/12/2020, Date of Acceptance: 26/12/2020, Date of Publication: 27/12/2020   बबीता काजल सह आचार्य, हिन्दी विभाग, चै. बल्लूराम गोदारा राजकीय कन्या महाविद्यालय, श्रीगंगानगर, राजस्थान, भारत Abstract   व्यक्ति के सम्प ूर्ण व्यक्तित्त्व का विकास करना अधिकारा ें व मूलाधिकारों का उद्देश्य ह ै। मानव कल्याण की कामना सभ्यता का उच्चत्तम लक्ष्य ह ै आ ैर भारतीय संस्कृति का बीज तत्त्व भी है। मानव जीवन का े सुरक्षित,सुखी व शांतिप ूर्ण बनाने के लिए मानवाधिकार की संकल्पना की गई। मनुष्य जीवन का े श्र ेठ बनाने में परिवेश की ही भा ंति पर्या वरण भी महत्वपूर्ण भ ूमिका निभाता है। पर्या वरण के साथ खिलवाड ़ सम्प ूर्ण मानव जाति के-“जीने के अधिकार” का हनन ह ै। प्राकृतिक आपदाएं मानव सभ्यता के लिए चेतावनी की तरह ह ै। पर्या वरण क्षरण को रा ेकना हजारा ें वर्षों की मानव सभ्यता को सुरक्षित रखने की दिशा में सकारात्मक कदम होगा। पर्या वरण को नुकसान पह ुंचा कर मानव को जा े आघात ...

ैनेन्द्रजी के उपन्यासो मे नारी- संघर्ष के स्वरूप Forms of Female Struggle in the Novels of Jainendra

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  Anthology The Research: (ISSN: 2456–4397 RNI No.UPBIL/2016/68067 Vol-5* Issue-9* December-2020)   Paper Submission: 15/12/2020, Date of Acceptance: 26/12/2020, Date of Publication: 27/12/2020   गायत्री चैहान सहायक प्राध्यापक, हिन्दी विभाग, शासकीय स्नातकोत्तर महा. खरगोन, मध्य प्रदेश, भारत Abstract   स्वतंत्रता के पूर्व और पाश्चात्य के उपन्यासकारों ने सामाजिक, आर्थिक ओर राजनीतिक परिस्थितिया ें को हमारे समक्ष प ्रस्तुत किया है, इस समय के अधिकांश उपन्यास ऐसे ह ै जिनमे उच्चवर्ग, मध्यवर्ग एवं निम्नवर्ग की भावनाओं का े समावेश हुआ ह ै। जैनेन्द्र के अधिकांश उपन्यास तथा कहानियां ग्रामीण के साथ-साथ शहरी क्षेत्रा ें मे उहापोह को भी प ्रदर्शि त करते ह ै। जैनेन्द्र के अपने उपन्यासों के माध्यम से स्त्रिया े की मना ेदशा का े स्पष्ट किया है। स्त्रिया ें की शिक्षा-दिशा आ ैर पारिवारिक परिस्थितियों में मध्य स्त्री जीवन की वास्तविकताओं का े समाज के समक्ष प ्रस्तुत करने का श्रेय जैनेन्द्र जी को जाता ह ै। जैनेन्द्र जी का मानना ह ै कि स्त्रिया े का े परिवारवाद के अनुरूप ही रहना चा...

हिन्दी कथा साहित्य में अभिव्यक्त पितृसत्ता और स्त्री जीवन का यथाथ Patriarchate Expressed in Hindi Fiction and Reality of Female Life

  Anthology The Research: (ISSN: 2456–4397 RNI No.UPBIL/2016/68067 Vol-5* Issue-9* December-2020)   Paper Submission: 00/00/2020, Date of Acceptance: 00/00/2020, Date of Publication: 00/00/2020   गरिमा क ंचन शोधार्थी हिन्दी विभाग, लखनऊ विश्वविद्यालय का लखनऊ, यू.पी., भारत Abstract     इस लेख क े माध्यम से हिन्दी लेखिकाआ ें द्वारा हिन्दी कथा साहित्य म ें अभिव्यक्त पित्रसत्तात्मक समाज का े प्रस्तुत किया गया कि किस प ्रकार स्त्री का जीवन उसका ष्अपना जीवन ष्अपना नही बल्कि पुरूष सत्ता की जकडन में जकडा है। तमाम हिन्दी लेखिकाए यथामन्नू भण्डारी , प ्रभा खेतान, मैत्रयी प ुष्पा आदि ने इसे न केवल स्वयम जीवन में इसे महसूस किया बल्कि इसे कथा सहित्य से व्यक्त रूप में प ्रस्तुत किया ह ै। Through this article, Hindi writers have been presented to the patriarchal society expressed in Hindi fiction that how a woman's life is not her own life, but the man is in the grip of power. All Hindi writers, Yathamannu Bhandari, Prabha Khaitan, Maitreyi Pushpa etc. not only felt it i...

राजस्थानी गद्य शैली का विकास Rajasthani Prose Style Development

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  Anthology The Research: (ISSN: 2456–4397 RNI No.UPBIL/2016/68067 Vol-5* Issue-9* December-2020)   Paper Submission: 15/12/2020, Date of Acceptance: 27/12/2020, Date of Publication: 28/12/2020   सीताराम मीना सह आचार्य, हिन्दी विभाग, स्व.राजेश पायलट राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, बांदीकुई राजस्थान, भारत Abstract   यह ह ै कि शैली को व्यक्तित्व से प ृथक नही ं किया जा सकता ह ै। साहित्यकार का जीवन, जीवन नही है, अपितु साहित्य ही उसका अपना जीवन ह ै। श ैली के क्षेत्र का निर्धा रण करने पर यह ज्ञात हा ेता है कि व्यक्ति (लेखक), भाषा, विषय, पाठक, देश-काल एवं जलवायु श ैली के मूल स्त्रा ेत ह ै जा े श ैली का परिनिष्ठित स्वरूप निर्धारित करते ह ै। शैली लेखक, विषय अथवा भाषा का साध्य नहीं ह ै, साधन ह ै, किन्तु वह साहित्य की मोैलिकता का े सुरक्षित रखने का कार्य करती ह ै। अतः यह निश्चित रूप से स्वीकार कियाजा सकता है कि ‘‘श ैली की अनुपस्थिति में‘‘ साहित्य जीवित नहीं रह सकता। ‘‘श ैली’’ के तात्विक विव ेचन के अन्तर्गत उपर्यु क्त समस्त तत्वों का अध्ययन आवश्यक है। श ैली से हमारा तात्...

लद्दाख का प्रकृतिक सौन्दर्य Natural Beauty of Ladakh

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  Anthology The Research: (ISSN: 2456–4397 RNI No.UPBIL/2016/68067 Vol-5* Issue-9* December-2020)   Paper Submission: 15/12/2020, Date of Acceptance: 26/12/2020, Date of Publication: 27/12/2020   सुमन कुमारी मीना शोधार्थी हिन्दी विभाग, महर्षि दयानन्द सरस्वती विश्वविद्यालय, अजमेर, राजस्थान, भारत र ेणु वर्मा सह आचार्य हिन्दी विभाग, राजकीय स्नाकोत्तर महाविधालय, टोक, भारत Abstract   सा ैन्दर्य हिन्दी भाषा का एक ऐसा अनूठा शब्द ह ै जिसको सुनकर व्यक्ति के दिमाग मे सकारात्मक ऊर्जा  का संचार होता ह ै स सौन्दर्य युक्त वस्तु, व्यक्ति, स्थान, शहर आदि का े देखने पर मन मे सुविचार प्रस्फुटित होते ह ै एवं मानव मस्तिष्क शांति का अनुभव करता ह ै स वस्तुतः सौन्दर्य दा े प्रकार के हा ेते ह ै स पहला सा ैन्दर्य कृत्रिम या बनावटी सौन्दर्य, जिसकी उत्पत्ति बाजारवाद कि देन ह ैस दूसरा ह ै, प्रकृतिक सा ैन्दर्य जा े कि प्रकृति द्वारा स्वंय ही उत्पादित होता ह ै स प्रकृतिक सौन्दर्य प्रकृति का श्र ेष्ठ रूप ह ै जा े कि मानव की कुंठित एवं विस्तारवादी सोच से बचा ह ुआ ह ैस प्रकृतिक सा ैन्दर...

राजेन्द्र मोहन भटनागर के उपन्यासा ें मे ं जीवन मूल्य Life Value in The Novels of Rajendra Mohan Bhatnagar

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  Anthology The Research: (ISSN: 2456–4397 RNI No.UPBIL/2016/68067 Vol-5* Issue-9* December-2020)   Paper Submission: 15/12/2020, Date of Acceptance: 26/12/2020, Date of Publication: 27/12/2020   स ंजय कुमार मीणा शोधार्थी हिन्दी विभाग, राजकीय महाविद्यालय, टोंक, राजस्थान, भारत Abstract   उपरा ेक्त जीवन मूल्या ें के आधार पर कहा जा सकता है कि सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक, राजनीतिक आदि मूल्या ें का मनुष्य के जीवन में प ्रमुख स्थान ह ै, वह सभी स्वरूपों का प ्रमुख आधार स्वरूप ह ै, जिसस े मनुष्य क े जीवन मूल्य बदलते है उनके अनुरूप ह ै मनुष्य को अपना स्वभाव, रहन-सहन आदि परिवर्तित करना और वर्तमान स्वरूप के अनुसार कार्य करना।   On the basis of the above values of life, it can be said that social, economic, religious, political etc. values have a prominent place in the life of a human being, he is the main basis of all the forms, which changes the life values of a human being according to them. Change your nature, way of life etc. and work according to the present fo...

श्री रामचरितमानस के लक्ष्मण चरित्र में निहित भक्ति तत्व-भाव की विशेषताओ ं की समीक्षा Review of the Characteristics of the Bhaktitva Bhava contained in the Lakshmanacharitra of Shri Ramcharitmanas

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  Anthology The Research: (ISSN: 2456–4397 RNI No.UPBIL/2016/68067 Vol-5* Issue-11* February-2021 )   Paper Submission: 15/02/2021, Date of Acceptance: 26/02/2021, Date of Publication: 27/02/2021   रूक्साना अत्तार शोध छात्रा, हिन्दी विभाग, हिमालयन यूनिवर्सिटी, ईटानगर, अरूणाचल प्रदेश, भारत गा ेविन्द द्विव ेदी हिन्दी विभाग, हिमालयन यूनिवर्सिटी, ईटानगर, अरूणाचल प्रद ेश, भारत Abstract   श्री राम, जा े कि भगवान श्री विष्ण ु जी के अवतार माने जाते ह ैं, उनक े र्भाइ  लक्ष्मण जी ने राम के प ्रति भक्ति-भावना का निरूपण किया ह ै। वन गमन के दौरान चा ैदह साल तक अपनी पत्नी उर्मिला से दूर रहकर लक्ष्मण जी ने अपने भाई श्री राम की सेवा कर समस्त विश्व में अनूठा उदाहरण प ्रस्तुत किया ह ै। लक्ष्मण जी को मेघनाद द्वारा छोड़ी र्गइ  शक्ति के कारण मूर्छा वस्था में आने के बावजूद भी लक्ष्मण की सेवा व भक्ति में का ेई भी कमी नहीं आई।चा ैर्पाइ  व दोहा े के माध्यम से राम चरित मानस में तुलसीदास जी ने लक्ष्मण जी के मन, वचन व कर्म से समर्पित भावों का व्याख्यान किया ह ैं। जब-जब धरत...

इक्कीसवी ं सदी में हिंदी संस्मरणात्मक साहित्य का अर्थ, परिभाषा, स्वरूप, वर्गीकरण, विकास एवं अन्य विधाआ ें के साथ तुलनात्मक अध्ययन’’ Study of The Meaning, Definition, Form, Classification and Development of Memoirs in Hindi Literature in the Twenty-First Century and Comparison with Other Genres

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  Anthology The Research: (ISSN: 2456–4397 RNI No.UPBIL/2016/68067 Vol-5* Issue-11* February-2021 )   Paper Submission: 15/02/2021, Date of Acceptance: 26/02/2021, Date of Publication: 27/02/2021   गजानन्द मीणा शोधार्थी, हिन्दी विभाग, राजकीय कला महाविद्यालय, कोटा, राजस्थान, भारत Abstract   स्मृति केआधार पर किसी विषय पर अथवा किसी व्यक्ति पर लिखित आलेख को संस्मरण कहलाता ह ै। संस्मरण विधा मनुष्य के लिए एक उत्सुकता का विषय ह ै। संस्मरण विधा में शोध कार्य करते समय न जाने कितने लोगा ें के चरित्रा ें से हमें जीवन जीने की प ्रेरणा मिल गयी। किसी घटना या व्यक्ति से सम्बन्धित अनुभ ूति जब लेखक के हृदय पटल पर आकर मन के भीतर ही भीतर कुरेदती ह ै तब वह अनुभ ूति अभिव्यक्ति के रूप में साकार हा े संस्मरण बन जाती ह ै। संस्मरण लेखक के निजी जीवन की घटनाआ ें पर आधारित होता ह ै। यह लेखक का अपना अनुभव हा ेते होते ह ुए भी दूसरे के जीवन को उद्घाटित करता ह ै जिससे तत्कालीन परिस्थिति का बोध हा ेता ह ै। संस्मरण म ें लेखक अपने जीवन के अतीत में पह ुँचकर अपने स्मृतिकोश में सुरक्षित व्यक्ति, ...