Posts

Showing posts with the label sanskrit

आधुनिक स्थापत्य कला का स्रोत-वैदिक युग (Vedic Yuga – The Inspiration Behind Modern Architecture)

Image
Srinkhala Ek Sodhparak Vaicharik Patrika   (P: ISSN NO.: 2321-290X RNI : UPBIL/2013/55327 VOL-7* ISSUE-11* July- 2020 E: ISSN NO.: 2349-980X) Paper Submission: 05/07/2020, Date of Acceptance: 23/07/2020, Date of Publication: 27/07/2020 Abstract अंजू सेठ  एसोसिएट प्रोफेसर, संस्कृत विभाग, सत्यवती महाविद्यालय, दिल्ली, भारत ेद ज्ञान के रत्नाकर है ं। सभी कलाएं एवं विद्याए ं व ेद निसृत है ं जो विविध आयामों एवं अनन्त दिशाओं का े प्राप्त कर सर्वाङ्गीणता का े प्राप्त करती ह ैं। त्रिकाला तीत स्थापत्य कला के व ैदिक युगीन उपलब्ध तथ्यों का े मूल उद्धरणों के माध्यम से विव ेचित करना एवं वर्तमान युगीन गृह निर्मा ण एवं स्थापत्य कला संबंधी तथ्यों का विवेचनात्मक विश्लेषणात्मक एव ं तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत कर काल जयी व ैदिक युगीन स्थापत्य कला की विशिष्टता प्रदर्शित करना तथा वर्तमान स्थापत्य कला के सिद्धान्तों का स्रा ेत व ैदिक मन्त्रों के माध्यम से प्रदर्शि त कर विव ेचित करना ही इस लेख का परम उद्द ेश्य ह ै।         The Vedas are the reservoir of all the knowledge man has ...

धर्मशास्त्र में स्त्रियो के अधिकारः एक विश्लेषण (Rights of Women in Theology: An Analysis)

Image
Srinkhala Ek Sodhparak Vaicharik Patrika   (P: ISSN NO.: 2321-290X RNI : UPBIL/2013/55327 VOL-7* ISSUE-11* July- 2020 E: ISSN NO.: 2349-980X) Paper Submission: 00/00/2020, Date of Acceptance: 00/00/2020, Date of Publication: 00/00/2020 Abstract   मनीषा  अरोड़ा शोधार्थिनी संस्कृत  विभाग, जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय, जोधपुर राजस्थान, भारत किसी भी समाज अथवा राष्ट्र के सर्वता ेम ुखी विकासोभ्युदय ह ेतु स्त्री व पुरुष का समान महत्त्व हा ेता है। पुरुष यदि घर से बाहर के कार्या ें की स ुचारुता एवं उन्नति का कर्तव्य वहन करता है तो स्त्री सेवा, सुश्रूषा, स्नेहादि के माध्यम से घर के विभिन्न कष्टसाध्य दायित्वों का निर्वाह करती हुई अपनी सार्थकता को सिद्ध करती है। स्त्री व पुरुष दोनेां एक दूसरे के पूरक है एवं एक दूसरे के बिना अधूरे हैं। स्त्री के विविध रूप है ं- पुत्री, भगिनी, पत्नी, माता, आदि। इन सभी रूपा ें का सम्बन्ध वस्तुतः परिवार नामक संस्था से है। स्त्री के विषय में जब भी चर्चा करते हैं तो सर्वप्रधान परिवार नामक संस्था के सन्दर्भ  म ें उसके स्वरूप को प्रकट करना अनिवा...

संस्कृत प्रशस्तियो का स्वरूप व प्राप्ति स्थान - एक पर्यवेक्षण (Nature and Place of Acquisition of Sanskrit Commendations)

Image
Srinkhala Ek Sodhparak Vaicharik Patrika   (P: ISSN NO.: 2321-290X RNI : UPBIL/2013/55327 VOL-7* ISSUE-11* July- 2020 E: ISSN NO.: 2349-980X) Paper Submission: 02/07/2020, Date of Acceptance: 21/07/2020, Date of Publication: 25/07/2020  Abstract   माना राम  चौधरी  शोधार्थी, संस्कृत  विभाग, जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय, जोधपुर राजस्थान, भारत संस्कृत प्रशस्तियाँ, व्यापकता के साथ उन सभी स्थलों पर प ्राप्त होती ह ैं जहाँ पर हमें अन्य अभिलेखों की प ्राप्ति हो सकती ह ै। वस्तुतः प ्रशस्तियाँ अभिलेखो का ही एक स्वरूप होने के कारण इनकी प ्राप्ति का स्वरूप अत्यन्त ही व्यापक एवं विशाल है। यथा प ्रशस्तिया ें के प ्रारम्भिक विवरण में लिखा गया कि प ्रशस्तियाँ किसी राजा द्वारा दिये गय े दान के सन्दर्भ  में लिखा गया प्रशंसात्मक अभिलेख ही है। ऐसे में राजा द्वारा, भूमिदान, मन्दिर निर्मा ण, कूप निर्मा ण, वापी निर्माण, तड़ाग निर्मा ण आदि के साथ ही लिखे गये अभिलेख राजा के वंशावली की तथा दानदाता राजा के स्वयं की प्रशंसा में लिखा हुआ होता ह ैं। इस दृष्टि से देखा जाय ता े प...

कालिदास के रूपकों में प्रमुख स्त्री-पात्रों की विनियोजना का वैशिष्ट्य (Key Female Characters in Kalidasa's Metaphors Characteristics of The Project)

Image
Anthology The Research   ( ISSN: 2456–4397 RNI No.UPBIL/2016/68067 Vol-5* Issue-10* January-2021 )  Paper Submission: 12/01/2020, Date of Acceptance: 26/01/2021, Date of Publication: 27/01/2021 Abstract   सुस्मिता रानी शोध छात्रा, संस्कृत विभाग, बी0 आर0 ए0 बिहार विश्वविद्यालय, मुजफ्फरपुर, बिहार, भारत  महाकवि कालिदास के रूपकों में जिन प्रमुख स्त्री-पात्रो ं की विनिया ेजना हुई ह ै उन सभी स्त्री पात्रों का अपना भिन्न ही वैशिष्ट ्य है। इस वैशिष्ट ्य के कारण ही वे पात्राएँ प्रभावशालिनी बन गई हैं। इतना ही नहीं, उन स्त्री पात्रो ं के विनिया ेजन से जहाँ रूपकों की कथा-वस्तु का े अग्रसर हा ेन े का अवसर मिला है वहाँ घटना-क्रम का े प्रस्तुत करने में रूपककार का े यथ ेष्ठ सफलता मिली है। जहाँ तक रूपकों के उद्द ेश्य की बात है, उनका उद्देश्य उन स्त्री-पात्रों क े माध्यम से नारी-मना ेविज्ञान का उद्घाटन करना है आ ैर पाठकों तथा दर्शका े ं का े आदर्श की प्र ेरणा प्रदान करना ह ै। ‘मालविकाग्निमित्र’ रूपक के अन्तर्गत मालविका प्रथमतः महारानी की नृत्य-स ंगीतक ुशला परिचायिका के रूप में चित...

Rājadharma-As A Technical Term for Understanding of Ancient Indian Good Governance

Image
  Asian Resonance   ( P: ISSN No. 0976-8602 RNI No. UPENG/2012/42622 VOL.-9, ISSUE-2, April 2020 E: ISSN No. 2349-9443  ) Abstract   Anil Pratap  Giri Associate Professor Department of Sanskrit Mahatma Gandhi Central University, Motihari, Bihar, India Rājadharma comprises two words one is Rāja and other is Dharma. Rāja means ruler or king and dharma means his duty or property which must be possessed by him. Rājadharma is a determinative compound word of Sanskrit in which, meaning of the second word of compound has a supremacy.1 The meaning of the first word generally deals relationship with the second word. Thus, the literary meaning of this compound word is Rājño Dharmaḥ iti Rājadharmaḥ. Rājñāṁ Dharmaḥ iti vā. It means the peculiar duty of the ruler or rulers is called Rājadharma. Here, Duty is the property and the ruler is the property-holder, ruler holds that duty. The relationship between property and property-holder is Dharma-dharmi-bhāva-sambandha. As ...

The Relevence of Profound Indigenous Thought Based on “Upanisad”, “Bhagavad-gita” and “Patrabali”

Image
Asian Resonance   ( P: ISSN No. 0976-8602 RNI No. UPENG/2012/42622 VOL.-9, ISSUE-4, October 2020 E: ISSN No. 2349-9443 ) Paper Submission: 10/10/2020, Date of Acceptance: 27/10/2020, Date of Publication: 27/10/2020 Abstract   Kusumlata Banerjee  Retd. Associate Professor, H.O.D. Dept. of Sanskrit, Bankura Zilla Saradamani Mahila Mahavidyapith, Bankura, West Bengal, India  India has been known to other nation as a land of wealth and philosophic wisdom. Indian culture is based on the ancient Vedic Teachings of spiritualism. Indian culture in its long career has experimented with life in its diverse aspects and levels. It has not neglected any of the values of life, but it has concentrated more in the field of Philoshophy and Religion. Politics, Economic, Art, Science, Mathematics, Astrology, Ayurveda, Music etc. all these have been enriched by itscontributions; But its greatest and most unique contribution is in the wide area of Religion and Philosophy. “Culture me...

महाभारत: लोककल्याण का दर्शन-ग्रन्थ

Periodic Research   ( P: ISSN No. 2231-0045 RNI No. UPBIL/2012/55438 VOL.-V, ISSUE-I,  August-2016  E: ISSN No. 2349-9435) Abstract   मनीष पाण्डेय असिस्टेंट प्रोफेसर  , संस्कृत विभाग जवाहरलाल नेहरू मेमो0 पी0 जी0 काॅलेज, बाराबंकी उ0प्र0 महाभारत, भारत के धर्म तथा तत्व ज्ञान का विश्वकोष ह ै। धर्म ही भारतीय संस्कृति का प्राण ह ै आ ैर इसीलिए महर्षि  वेदव्यास ने अधर्म से देश का नाश तथा धर्म से राष्ट्र के अभ्युत्थान की चर्चा करते ह ुये लोक-कल्याण के दृष्टिगत एक विश ेष आदर्श के अनुसार जीवनयापन के दार्श निक मूल्या ें का उल्लेख किया ह ै। व्यक्तिगत जीवन आत्मकल्याण के साथ-साथ लोक कल्याण का भी विधायक हो, तभी विश्वकल्याण सम्भव है। नियमित तथा सुखद जीवन प ्रत्येक लक्ष्य का साधक ह ै। मानव का आध्यात्मिक कल्याण इन्द्रियनिग्रह से ही सम्भव है। क्या ेंकि इसके अभाव में इन्द्रियों का दासत्व व्यक्ति को मनुष्यत्व से दूर ले जाता है। for full paper please visit below link : http://www.socialresearchfoundation.com/upoadreserchpapers/2/119/1610280814211st%20manesh%20pandey2.p...

महर्षि वाल्मीकि कृत रामायण मे धर्म

Periodic Research   ( P: ISSN No. 2231-0045 RNI No. UPBIL/2012/55438 VOL. -V, ISSUE-II, November-2016 E: ISSN No. 2349-9435 ) Abstract   सान्त्वना  द्विवेदी  असिस्टेन्ट प्रोफेसर, संस्कृत विभाग, डी0 ए0 वी0 पी0जी0 कालेज, लखनऊ विश्वविद्यालय, लखनऊ इस प्रकार धर्म मानव जीवन का अनिवार्य अंग ह ै। धर्म स्व से उठकर अपनी आत्मा का सर्व व्यापक जगत आत्मा के साथ संब ंध स्थापित करता ह ै। रामायण में मानव कल्याण सम्बन्धी अनेक धार्मिक नीतियों का आख्यान ह ै जो वर्तमान समय म ें भी समाज और हमारे जीवन को दशा और दिशा प्रदान करता ह ै। for full paper please visit below link : http://www.socialresearchfoundation.com/upoadreserchpapers/2/126/1702281239111st%20santwana%20dwivedi.pdf

वाचिक अभिनय और लक्षणानुशीलन

Image
Periodic Research   ( P: ISSN No. 2231-0045 RNI No. UPBIL/2012/55438 VOL. -5, ISSUE-3, February-2017 E: ISSN No. 2349-9435 ) Abstract   जय प्रकाश नारायण सहायकाचार्य,  संस्कृत विभाग, राष्ट्रीय संस्कृत संस्थानम्, दिल्ली नाटष्ट प्रयोग की प्रभावोत्पादकता के लिय े अभिनयगत कुशलता और काव्यबन्ध के उत्क ृष्टता दोनो आवश्यक अ ंग है । ना. शा. में चार प्रकार के अभिनया ें का वर्णन आया है -आंगिक, वाचिक, सात्विक और आहार्य। इनमें सम्पूर्ण वाचिक अभिनय काव्यबन्ध पर आधारित होता है । अतः भरतमुनि ने शोभाधयक तथा शा ेभापकर्षक तत्त्वों की चर्चा की है। काव्यबन्ध का तात्पर्य नाटष्टकृति स े है जिस े पाठष्ट भी कहा जा सकता है । यह कविकृत एक प्रसिद्ध या कल्पित वर्णन होता है जिसको स ंवादो ं के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। दर्शकदीर्घा में उपस्थित प्र ेक्षक वर्ग का इस पाठष्ट के प्रति भी अनुराग हो अथवा पाठष्ट क े माध्यम स े उनमें आनन्दातिर ेक की स ृष्टि की जा सके, इसके लिय े पाठष्ट का स ुसंगठित रूप अत्यावश्यक है । पाठष्ट को स ुसज्जित एवं उत्क ृष्ट बनाने के लिय े अनेक उत्कर्षधयक तत्त्वों का ...

वैदिक ऋचाओं में संकलित वैज्ञानिक तथ्य

Periodic Research   ( P: ISSN No. 2231-0045 RNI No. UPBIL/2012/55438 VOL. -5, ISSUE-4, May - 2017 E: ISSN No. 2349-9435 ) Abstract   माधवी शर्मा  प्राचार्या, संस्कृत विभाग, डी. बी.(पी. जी.) महाविद्यालय, खेरली, अलव व ेद ज्ञान के अजस ्र स्त्रोत ह ै। व ैदिक ऋचाआ ें में व ैज्ञानिक तथ्या ें के अपूर्व भण्डार ह ैं। इन ऋचाआ ें में विज्ञान की समस्त शाखाओं का ज्ञान समाहित ह ै। ऋग्वेद, यजुर्व ेद, अथर्ववेद इन तीनों ही व ेदा ें में विज्ञान का ज्ञान ह ै। समस्त व ेदा ें के व ैज्ञानिक आधार पर निष्कर्ष निकलता ह ै कि अथर्वा  ऋषि विश्व के प ्रथम वैज्ञानिक ह ैं। व ैदिक ऋषि वैज्ञानिक शा ेधकर्ता थ े। भा ैतिक विज्ञान, रसायन विज्ञान, जीव विज्ञान, जन्तु विज्ञान, कृषि विज्ञान, गणित शास्त्र आयुर्वेद आदि समस्त विज्ञान की शाखाओं के ज्ञाता थ े, आविष्कारक थे। गुरूत्वाकर्ष ण का रहस्य बताने वाले भास्कराचार्य ने अपने सिद्वान्त शिरोमणि ग्रन्थ में गुरूत्वाकर्षण के नियम के विषय में बताया। ‘पृथ्वी अपने आकाश का पदार्थ  स्व शक्ति से अपनी ओर खींच लेती ह ै। इस कारण आकाश का पदार्थ प ृथ्वी पर गिर...

भक्ति रसायन में भक्ति रस विमर्श

Image
Periodic Research   ( P: ISSN No. 2231-0045 RNI No. UPBIL/2012/55438 VOL.-6, ISSUE-4, May-2018 E: ISSN No. 2349-9435 ) Abstract   जयप्रकाश नारायण एसोसिएट प्रोफेसर, संस्कृत विभाग, जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्ली, भारत मध ुसूदन सरस्वती ने भक्ति को रसायन अर्था त् आ ैषधि माना ह ै! उनका भक्तिरूप आ ैषधि केवल किसी रोग विशेष का नहीं अपितु समस्त रा ेगा ें के ह ेतु जन्म-मरण से मुक्त करती ह ै। जिसके बाद रा ेगा े से प ुनरू पीडित हा ेने की सम्भावना भी समाप्त हो जाती है। इससे ब ्रह्मानन्द रूप तंदुरूस्ती प्राप्त होता ह ै। भगवत्साक्षात्कार ही प्रस्तुत ग्रन्थ का प्रयोजन ह ै। भक्ति रसायन में १४७ कारिका हैं तथा तीन उल्लासों में यह विभक्त है! समस्त ग्र ंथ पद्यात्मक है। for full paper please visit below link : http://www.socialresearchfoundation.com/upoadreserchpapers/2/213/1908121020481st%20jai%20prakash%20narayan.pdf  

रस सिद्धान्त विमश

Image
Periodic Research   ( P: ISSN No. 2231-0045 RNI No. UPBIL/2012/55438 VOL.-7, ISSUE-3, February-2019 E: ISSN No. 2349-9435 )  Abstract   चन्द्र किशोर  असिस्टेंट प्रोफेसर, संस्कृत विभाग, ब्रह्मावर्त पी0 जी0 काॅलेज, मन्धना, कानपुर, उ0 प्र0 काव्य को पढ़ने, सुनने या नाटक आदि का े देखते समय जा े आनन्द की अनुभूति होती है, उसे रस कहते है ं अर्था त् रस अन्तःकरण की वह शक्ति ह ै, जिसके कारण इन्द्रियाँ अपना कार्य करती हैं, मन कल्पना करता ह ै, स्वप्न की स्मृति रहती है। रस आनन्द रूप तथा विशाल एवं विराट का अनुभव ह ै। ‘‘रसा े वैरसः’’ अर्थात् वह परमात्मा ही रस रूप आनन्द ह ै। सुख-दुःखात्मक किसी भी प ्रकार के दृश्यावलोकन, काव्य के पठन, श्रवण से दृवीभ ूत होकर पाठक या श्रोता के मन म ें जा े एक विश ेष प्रकार की ‘अनिर्वचनीयता’, अदृश्य या आमूर्त अनुभ ूति सी स्वतः प्रकाशित होती ह ै, उसी का नाम रस ह ै। उसकी अनुभूति के क्षणा ें में व्यक्ति की मना ेदशा आ ैर चेहरे के हाव-भाव में एक प ्रकार की स्वाभाविकता आ जाती है। उस स्थिति में मुख से अनायास हाय!, आ ेह!, आह!, अरे! जैसे शब्द निकलते ...

धर्मक्षेत्रे कुरूक्षेत्रे समवेताः युयुत्सवः

Periodic Research   ( P: ISSN No. 2231-0045 RNI No. UPBIL/2012/55438 VOL.-7, ISSUE-4, May-2019 E: ISSN No. 2349-9435 )  Abstract   अनिता सेनगुप्ता एसोसिएट प्रोफेसर , संस्कृत विभाग, ईश्वर शरण डिग्री काॅलेज, इलाहाबाद, यू 0 पी0 भारत श्रीमद्भगवद्गीता का प ्रथम दृश्य य ुद्धभूमि का है। दा ेनों आ ेर स्वजनसम्बन्धी तथा आत्मीयजन खड़े हैं। धृतराष्ट ª संजय से, जिन्हा ेंने महर्षि  व ेदव्यास द्वारा दूर-दर्शन एव ं दूर-श्रवण रूप शक्तिद्वय अर्जित किया है, उनस े य ुद्ध का विवरण पूछत े हुए कहते हैं- धर्म क्षेत्रे कुरूक्षेत्रे समव ेताः य ुय ुत्सवः। माम ेकाः पाण्डवाश्च ैव किमकुर्व त सञ ्जय।।1 धर्म क्षेत्र कुरूक्षेत्र म ें एकत्र हुए योद्धओं ने य ुद्धारम्भ कैसे किया? किसका किससे य ुद्ध हुआ एव ं किसके द्वारा किसका वध किया गया? धृतराष्ट ª के इन प ्रश्नों तथा ‘य ुय ुत्सवः’ पद म ें युद्ध का संप ूर्ण दर्शन निहित है। हम सभी जानते है ं कि य ुद्ध समाज क े हित म ें नहीं होता, फिर भी इस आवश्यक ब ुर्राइ  या दा ेष म ें सर्व था म ुक्त रहना स ंभव भी नहीं है, किन्त ु इसके दोष को कम करके...