वाचिक अभिनय और लक्षणानुशीलन

Periodic Research (P: ISSN No. 2231-0045 RNI No. UPBIL/2012/55438 VOL. -5, ISSUE-3, February-2017 E: ISSN No. 2349-9435)


Abstract



 जय प्रकाश नारायण

सहायकाचार्य,

 संस्कृत विभाग,

राष्ट्रीय संस्कृत संस्थानम्,

दिल्ली

नाटष्ट प्रयोग की प्रभावोत्पादकता के लिय े अभिनयगत कुशलता

और काव्यबन्ध के उत्क ृष्टता दोनो आवश्यक अ ंग है । ना. शा. में चार

प्रकार के अभिनया ें का वर्णन आया है -आंगिक, वाचिक, सात्विक और

आहार्य। इनमें सम्पूर्ण वाचिक अभिनय काव्यबन्ध पर आधारित होता है ।

अतः भरतमुनि ने शोभाधयक तथा शा ेभापकर्षक तत्त्वों की चर्चा की है।

काव्यबन्ध का तात्पर्य नाटष्टकृति स े है जिस े पाठष्ट भी कहा जा सकता

है । यह कविकृत एक प्रसिद्ध या कल्पित वर्णन होता है जिसको स ंवादो ं

के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। दर्शकदीर्घा में उपस्थित प्र ेक्षक वर्ग का

इस पाठष्ट के प्रति भी अनुराग हो अथवा पाठष्ट क े माध्यम स े उनमें

आनन्दातिर ेक की स ृष्टि की जा सके, इसके लिय े पाठष्ट का स ुसंगठित

रूप अत्यावश्यक है । पाठष्ट को स ुसज्जित एवं उत्क ृष्ट बनाने के लिय े

अनेक उत्कर्षधयक तत्त्वों का निर्देश किया गया है जिनमें लक्षण,

अलंकार गुण आदि प्रमुख हैं।1

इनमें स े काव्यलक्षण की काव्यशास्त्रीय

चर्चा भरत के नाट्ष्टशास्त्रा स े ही प्रारम्भ होती है।

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