रस सिद्धान्त विमश
Periodic Research (P: ISSN No. 2231-0045 RNI No. UPBIL/2012/55438 VOL.-7, ISSUE-3, February-2019 E: ISSN No. 2349-9435)
Abstract
असिस्टेंट प्रोफेसर,
संस्कृत विभाग,
ब्रह्मावर्त पी0 जी0 काॅलेज,
मन्धना, कानपुर, उ0 प्र0
काव्य को पढ़ने, सुनने या नाटक आदि का े देखते समय जा े आनन्द
की अनुभूति होती है, उसे रस कहते है ं अर्था त् रस अन्तःकरण की वह शक्ति
ह ै, जिसके कारण इन्द्रियाँ अपना कार्य करती हैं, मन कल्पना करता ह ै, स्वप्न
की स्मृति रहती है। रस आनन्द रूप तथा विशाल एवं विराट का अनुभव ह ै।
‘‘रसा े वैरसः’’ अर्थात् वह परमात्मा ही रस रूप आनन्द ह ै।
सुख-दुःखात्मक किसी भी प ्रकार के दृश्यावलोकन, काव्य के पठन,
श्रवण से दृवीभ ूत होकर पाठक या श्रोता के मन म ें जा े एक विश ेष प्रकार की
‘अनिर्वचनीयता’, अदृश्य या आमूर्त अनुभ ूति सी स्वतः प्रकाशित होती ह ै, उसी
का नाम रस ह ै। उसकी अनुभूति के क्षणा ें में व्यक्ति की मना ेदशा आ ैर चेहरे के
हाव-भाव में एक प ्रकार की स्वाभाविकता आ जाती है। उस स्थिति में मुख से
अनायास हाय!, आ ेह!, आह!, अरे! जैसे शब्द निकलते ह ैं, जो रस के स्वरूप
का े अभिव्यञिजत करते है ं।
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