समाज दर्शन की प्रकृति एवं अध्ययन क्षेत्र
Periodic Research (P: ISSN No. 2231-0045 RNI No. UPBIL/2012/55438 VOL.-7, ISSUE-2,
November-2018 E: ISSN No. 2349-9435)
Abstract
सहायक प्राध्यापक,
दर्शन शास्त्र विभाग,
महात्मा गाँधी काशी विद्यापीठ,
वाराणसी, उ0प्र0, भारत
समाज दर्शन को समझने के लिए हमें समाजदर्श न की प्रकृति एव ं
अध्ययन क्षेत्र का े अवश्य जानना चाहिए क्योंकि समाजदर्श न की प ्रकृति एव ं
अध्ययन क्षेत्र ही समाजदर्शन का े समाजशास्त्र एवं दर्श नशास्त्र से अलग करते
ह ै। प्रकृति की दृष्टि से समाजदर्श न नियामक एवं अमूर्त विषय के रूप में
दिर्खाइ देता ह ै क्या ेंकि हम समाजदर्श न एवं इसकी मुख्य बातों का े मानव एवं
समाज के व्यवहार में अनुभव करते ह ै। इस दृष्टि से समाजदर्श न एक
व्यावहारिक विषय के रूप में दिर्खाइ देता ह ै। अध्ययन क्षेत्र की दृष्टि से
समाजदर्श न अपने अध्ययन की अधिकांश सामग्री समाजशास्त्र एवं
राजनीतिशास्त्र से ग्रहण करता ह ै। समाजदर्श न अपनी प्रकृति के अनुसार इस
अध्ययन सामग्री की समीक्षा करने के बाद समाज के मूल्य एव ं आदर्शा ें की
स्थापना करता है।
for full paper please visit below link :
http://socialresearchfoundation.com/upoadreserchpapers/2/240/1908121258451st%20pitamber%20das.pdf

Comments
Post a Comment