अभाव के ज्ञान की समस्या: एक विवेचना
Periodic Research (P: ISSN No. 2231-0045 RNI No. UPBIL/2012/55438 VOL.-7, ISSUE-4 (Part-1) May-2019 E: ISSN No. 2349-9435 )
Abstract
असिस्टेंट प्रोफेसर,
दर्शन शास्त्र विभाग,
महात्मा गाँधी काशी विद्यापीठ,
वाराणसी, उ0 प्र0, भारत
हम प ्रायः ऐसे वाक्यों का प ्रयोग अपने दैनिक जीवन म ें करते हैं कि,
‘यहाँ क ुर्सी नहीं है’ अथवा ‘कमरे म ें म ेज नहीं है’ आदि। स्पष्ट ह ै कि यहाँ म ेज
अथवा कुर्सी का निश्चित स्थान अथवा कमरे म ें जा े अभाव है उसका हम ें बह ुत
सही सहज ज्ञान हा े रहा है। इसके लिए हम ें किसी प ्रकार के विशेष प ्रयास की
आवश्यकता भी नहीं पड़ती परन्तु यह सारा कार्य सम्भव कैसे हा ेता ह ै? क्या
म ेज अथवा कुर्सी के अभाव का व ैसा ही साक्षात् प ्रत्यक्ष हा ेता ह ै जैसा किसी
उपस्थित विषय का? अथवा किसी स्थान पर हमने र्कोइ वस्तु देखी थी किन्त ु
अब वहाँ वह वस्तु नहीं है अतः स्म ृति के आधार पर हम वस्तु के अभाव का
अनुमान करते हैं या फिर ‘अभाव’ न तो प ्रत्यक्ष द्वारा और न अनुमान द्वारा ज्ञेय
है बल्कि जैसा कुमारिल मीमांसको ं का मानना ह ै ‘अभाव’ का ज्ञान अनुपलब्धि
नामक स्वतंत्र प ्रमाण से ही सम्भव है? संक्षेप म ें, प ्रस्तुत ल ेख उपरोक्त प ्रश्ना ें पर
ही विचार करता है। यहा ँ म ैंने ‘अभाव’ के ज्ञान से सम्बन्धित मीमांसा-दर्शन क े
विचारों को केन्द्र म ें रखकर न्याय-सम्प ्रदाय और बौद्ध सम्बन्धों विचारों को भी
प ्रस्तुत किया है। प ुनः मीमांसा-दर्शन म ें भी म ैंने श्री नारायण भट्ट और श्री
नारायण पण्डित विरचित मानम ेयोदयःग्रन्थ के सन्दर्भ म ें अपनी बात कही ह ै
जिसम ें मीमांसक श्री कुमारिल भट्ट के विचारों का ही समर्थन है।
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