महाभारत: लोककल्याण का दर्शन-ग्रन्थ

Periodic Research (P: ISSN No. 2231-0045 RNI No. UPBIL/2012/55438 VOL.-V, ISSUE-I,  August-2016  E: ISSN No. 2349-9435)


Abstract


 मनीष पाण्डेय

असिस्टेंट प्रोफेसर ,

संस्कृत विभाग

जवाहरलाल नेहरू मेमो0 पी0 जी0

काॅलेज, बाराबंकी

उ0प्र0

महाभारत, भारत के धर्म तथा तत्व ज्ञान का विश्वकोष ह ै। धर्म ही

भारतीय संस्कृति का प्राण ह ै आ ैर इसीलिए महर्षि  वेदव्यास ने अधर्म से देश

का नाश तथा धर्म से राष्ट्र के अभ्युत्थान की चर्चा करते ह ुये लोक-कल्याण

के दृष्टिगत एक विश ेष आदर्श के अनुसार जीवनयापन के दार्श निक मूल्या ें का

उल्लेख किया ह ै। व्यक्तिगत जीवन आत्मकल्याण के साथ-साथ लोक

कल्याण का भी विधायक हो, तभी विश्वकल्याण सम्भव है। नियमित तथा

सुखद जीवन प ्रत्येक लक्ष्य का साधक ह ै। मानव का आध्यात्मिक कल्याण

इन्द्रियनिग्रह से ही सम्भव है। क्या ेंकि इसके अभाव में इन्द्रियों का दासत्व

व्यक्ति को मनुष्यत्व से दूर ले जाता है।

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