धर्मक्षेत्रे कुरूक्षेत्रे समवेताः युयुत्सवः
Periodic Research (P: ISSN No. 2231-0045 RNI No. UPBIL/2012/55438 VOL.-7, ISSUE-4, May-2019 E: ISSN No. 2349-9435)
Abstract
एसोसिएट प्रोफेसर,
संस्कृत विभाग,
ईश्वर शरण डिग्री काॅलेज,
इलाहाबाद, यू0 पी0
भारत
श्रीमद्भगवद्गीता का प ्रथम दृश्य य ुद्धभूमि का है। दा ेनों आ ेर
स्वजनसम्बन्धी तथा आत्मीयजन खड़े हैं। धृतराष्ट ª संजय से, जिन्हा ेंने महर्षि
व ेदव्यास द्वारा दूर-दर्शन एव ं दूर-श्रवण रूप शक्तिद्वय अर्जित किया है, उनस े
य ुद्ध का विवरण पूछत े हुए कहते हैं-
धर्म क्षेत्रे कुरूक्षेत्रे समव ेताः य ुय ुत्सवः।
माम ेकाः पाण्डवाश्च ैव किमकुर्व त सञ ्जय।।1
धर्म क्षेत्र कुरूक्षेत्र म ें एकत्र हुए योद्धओं ने य ुद्धारम्भ कैसे किया?
किसका किससे य ुद्ध हुआ एव ं किसके द्वारा किसका वध किया गया? धृतराष्ट ª
के इन प ्रश्नों तथा ‘य ुय ुत्सवः’ पद म ें युद्ध का संप ूर्ण दर्शन निहित है।
हम सभी जानते है ं कि य ुद्ध समाज क े हित म ें नहीं होता, फिर भी
इस आवश्यक ब ुर्राइ या दा ेष म ें सर्व था म ुक्त रहना स ंभव भी नहीं है, किन्त ु
इसके दोष को कम करके इसक े स्तर को उन्नत किया जा सकता है।
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