पहाड़ी चित्र शैली की उपशाखाओ ं में पश ु पक्षी चित्रण Animal Birds Illustration in Subdivisions of Hilltop Style

 Innovation : The Research Concept ISSN No. 2456–5474  RNI No. UPBIL/2016/68367 Vol.-6* Issue-1* February- 2021

Paper Submission: 02/02/2021, Date of Acceptance: 22/02/2021, Date of Publication: 24/02/2021 

नीलम का ंत
विभागाध्यक्ष,
सहायक प्राध्यापक,
चित्रकला विभाग,
श्रीमती बी.डी. ज ैन गल्र्स पीजीकाॅलेज, आगरा, उ0 प्र0, भारत
abstract
भारत की दूसरी प्रमुख कला शाखा राजपूत श ैली में जिसका एक रूप
पहाड ़ी शैली के नाम से विख्यात है इन दोना ें कलाशैलियों को परम्परागत समृद्धि
दी गई है राजपूत श ैली यद्यपि राजस्थान के विभिन्न प्रान्ता ें में अपना विकास कर
गई किन्तु उसका मूल उद्गम जयपुर समझा जाता है। राजपूत आ ैर पहाड़ी दोना ें
ही कलाशैलियों ने अपना स्वतंत्रत रूप से निर्माण किया फिर भी पहाड़ी शैली की
अपेक्षा राजपूत श ैली में कम प्रभाव एवं ला ेकपि ्रयता लक्षित हा ेती है, उन्नीसवी ं
शताब्दी के निर्मित राजपूत कलाकारों के भित्ति चित्र अपना अतुलनीय स्थान रखते
हैं साथ ही पहाड़ी श ैली का विस्तार भी अनेक शाखाआ ें में हुआ जिसमें कांगड़ा
श ैली प्रमुख है। पहाड़ी चित्रकला का विषय क्षेत्र विस्तृत रहा है, मध्यकालीन भक्ति
आ ैर श्रंृगार प्रधान जीवन का इतना सरस अन्तरंग आकर्षण व रा ेचक परिचय
पहाड ़ी श ैली के चित्रा ें में ही दिखाई देता है रंग आ ैर रेखाआ ें के सा ै ंदर्य में स े
प्रफ्फुलित हा ेते हुय े ये चित्र काव्य युक्त से लगत े है ं।
बसोहली श ैली में धार्मिक चित्रण पर आधारित पश ु-पक्षी अंकन का चित्र
जो लखनऊ संग्रहालय में आज भी सुरक्षित है जा े भागवत पुराण से लिया गया है
इसमें जीवा ें की उत्पत्ति के बारे में बताया है कि किस प्रकार परमात्मा ने पानी के
रूप में सारी ऊर्जा  को समाप्त करके एक ऊर्जा  उत्पन्न की अपनी अपार शक्ति के
बल से उन्हा ेंने यह निश्चित किया कि वह फिर से सृष्टि की रचना करेंगे। गुलेर
के शासकों में राजा गोवर्धन सिंह चित्रकला के असाधारण पोशक थे, लेकिन अपने
पुत्र प्रकाश सिंह में उनके समान कला के प्रति उत्सुकता व रूचि न थी, वह
कहना अनुचित न होगा कि प्रकाश सिंह कला के प्रति उदासीन थे इसी कारण
इसी काल में चम्बा आ ैर कांगड ़ा के राज्या ें में कला का महत्व बढ़ रहा था, गुलेर
श ैली में घरेलू पशु-पक्षी के चित्रा ें में एक चित्र जिसमें शिव शंकर पार्वती जीको
अपने परिवार के साथ चित्रित गया है जिसमें पार्वती एक धागे में छा ेटे-छा ेट े म ुँह
(नरमुंडमाला) को पिरो रही हैं।
बसोहली प्रभाव ग्रहण करने में चम्बा का नाम विश ेष रूप से आता है
अन्य पहाड़ी चित्रशैली की तरह चम्बा चित्रश ेली में दो प्रकार के चित्रा ें की विश ेषता
दिखती है इसमें एक आ ैर तो रूप चित्र की आ ैर दूसरी आ ेर पा ैराणिक विषयों का े
लेकर सुन्दर चित्रवालियाँ तैयार हुई है। चम्बा शैली में निर्मित राधा कृष्ण को एक
पेड ़ की छाँव में बैठे दिखाया गया है, पास ही कुछ गायों का अंकन है। गुलेर व
कांगड़ा के चित्रकारों के पास प्रातःकाल के रंग होते है ं तथा उनकी रंग तस्तरी पर
इन्द्रधनुष के रंग बिखरे हैं। कांगड़ा के चित्र पहाड़ी चित्रकला के स्वर्णि त नमूने है
इस शैली में पश ु-पक्षियों का बड़ा ही भावपूर्ण  चित्रण मिलता है। वर्षा में बगुला,
विरह में सारस व मा ेर आदि का े भावना के अनुकूल चित्रित किया गया है। इसका
कृष्ण ग्वालों वालों के साथ जंगल में गाय चराने जाते हुये का चित्र बह ुत सुन्दर
है। पहाड़ी चित्रकला श ैली की उपशैलियों में गढ़वाल श ैली का भी अपना महत्व है
गढ़वाल शैली में बने चित्र कृष्ण बांसुरी बजा रह े हैं आ ैर गाय मुँह उठाये सुन रही
है। बहुत ही संजीव अंकन चित्रकार ने प्रदर्शि त किया है।
In the Rajput style, the second major art branch of India, one of whose forms is known as Pahari style, both these art galleries have been given traditional prosperity. Although the Rajput style has developed in various provinces of Rajasthan, its origin is believed to be Jaipur. Both the Rajput and Pahari art galleries built their own independently, yet the Rajput style has less influence and popularity than the Pahari style, the nineteenthcentury In the Basohli style, a picture of animal-bird marking based on religious depictions which is still preserved in the Lucknow Museum, taken from the Bhagwat Purana, describes the origin of the creatures, how God has exhausted all the energy in the form of water. By creating an energy, with the power of his immense power, he ensured that That he will create the universe again
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