भारत में नगरीय समाज एक विश्ल ेषण An Analysis of Urban Society in India
Innovation : The
Research Concept ISSN No. 2456–5474 RNI No. UPBIL/2016/68367 VOL-
VI * ISSUE- IV * May - 2021
अतिथि विद्वान - समाजशास्त्र,
समाजशास्त्र विभाग,
शास. महाविद्यालय सिलवानी,
रायसेन, मध्य प्रदेश, भारत
भारत में नगरीय समाज की अवधारणा नगरों की उत्पत्ति तथा उसक े विकास
के इतिहास से जुड़ी ह ुई ह ै। यदि हम भारतीय नगरा े के सन्दर्भ में, अतीत म ें
देख े ता े विभिन्न प ्राचीन ऐतिहासिक तथा धार्मिक नगरा ें का स्वरूप देखने को
मिलता है प ्राप्त इतिहास के आधार पर अध्ययन करें ता े अति प्राचीन काल में
सिन्ध ु सभ्यता से जुड़े हड ़प्पा तथा मा ेहन जा ेदड ़ों नामक नगरा ें का स्वरूप
सामने आता ह ै।
‘‘नगरीय समाज का संब ंध एक आ ेर संसार के सभी समाजों से ह ै
वहीं दूसरी ओर नई प्रौद्योगिकी बदलते ह ुये सामाजिक मूल्या ें तथा सामाजिक
संरचना में होने वाले परिवर्तना े के फलस्वरूप नगरीय समाज में व्यापक
परिवर्तन हो रह े हैं।1
प ुरानी संस्कृतिया ें सभ्यता का जा े स्वरूप सामने आता है जहाँ उस
समय का नगरीय समाज वास करता था उसके बाद के समय में देख े ता े
विभिन्न धार्मिक एवं राजधानी नगरा ें का जिक्र आता ह ै जैसे अया ेध्या, मथ ुरा,
सा ेमनाथ, कन्नौज, दिल्ली, व ैशाली, गयाजी आदि। इन सभी नगरा ें म ें उस
समय की परिस्थितियों के अनुसार नगरीय समाज का स्वरूप देखने को मिलता
ह ै। व ैसे भारत में अधिकांश नगरा ें का विकास तटीय स्थलो पर अर्था त् नदियों
के तट पर ह ुआ ह ै।
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